ये सच्चा वाक़्या शुक्रवार 5 Oct 2012 है फिल्म शुरू होने के 10 मिनिट बांकी थे और फिल्म का नाम था English
Vinglish. अभी एंट्री बस स्टार्ट ही हुई थी की एक सज्जन थियेटर के गेट से अंदर गये. साधारण सी शर्ट और जीन्स की पैंट के संग सेंडिलस. पैंट की बाजू नीचे से फोल्ड की हुई थी. मेरी उन सज्जन के चेहरे पर नज़र गई और मेरी दिमाग़ की बत्ती सी जलने लगी. और मन में एक उत्सुकता सी फैल गई. मैं एकदम से शोफे से खड़ा हुआ और उनके पीछे पीछे चलने लगा. हॉल में एंट्री की, मुश्किल से 8-10 लोग ही उधर बैठे हुए थे और वो सज्जन भी एक उप्पर की पंक्ति में जाकर बैठ गये.
यधपि मेरी सीट उनसे काफ़ी दूर थी लेकिन मैं उत्सुकता में उन्ही की बगल वाली सीट में बैठ गया. अब मूवी भी शुरू हो चुकी थी लेकिन मेरा ध्यान मूवी की तरफ़ कम ओर उन सज्जन की तरफ ज़्यादा था- क्या ये वही हैं ? नही यार वो इस कबाड़ सिनेमा हॉल में क्यों आयेंगे ? वो मूवी देखते होंगे तो उनके संग उनके दोस्तों की पूरी फ़ौंज होती होगी वो बड़े आदमी हैं, वो कोट टाइ पहने रहते होंगे और साउथ एक्स के किसी कीमती हॉल में मूवी देखते होंगे. ऐसे चप्पल में फिल्म देखने थोड़े ही आएँगे...मैं ये सब सोच ही रहा था कि हल्की सी लाइट उनके चेहरे पर पड़ी. नही यार ये तो वही हैं, इतने बड़े टीवी चॅनेल और प्राइम टाइम के प्रस्तुतकर्ता इस सड़े से हॉल में हमारे सांथ..ये विचार मेरे मन में कौंध ही रहे थे की उन्होने अपना मोबाइल निकाला ओर ट्विटर चलाने लगे, एक ट्वीट किया और फिर मोबाइल जेब में रख दिया. मैने अपना मोबाइल निकाला ट्विटर ऑन किया टाइम लाइन चेक किया और जी हाँ अभी अभी उन्होने ही ट्वीट किया था. मैं बहुत खुश था और यूँ कहूँ की मन में लड्डू फूटना क्या होता है समझ रहा था, यकीन नही कर पा रहा था कि जिन्हे रोज टीवी में बड़े नडे नेताओं को अपने प्रश्नों से घायल करते हुए देखता हूँ, जिन्हे ट्विटर पर एक रिप्लाइ की चाह में हज़ारों ट्वीट करता हूँ और आज उन्ही के बगल में फिल्म देखने का आनंद उठा रहा हूँ मगर अभी भी कहीं ना कहीं मन में एक शंका सी थी की क्या ये वही हैं और यदि हाँ तो फिर वो यहाँ क्यों आएँगे. देखते ही देखते इंटरवल हो गया, लाइट्स ऑन हो गई, मैने उन सज्जन की तरफ नज़र घुमाई और यकीन हो गया था की ये वही हैं. मैं बाहर आया दो कॉफी ली और फिर अंदर चला गया, सीट पर बैठा और एक कप उनकी तरफ बड़ाते हुए बोला सर कॉफी वो सज्जन मेरी तरफ देखने लगे और बोले ये क्यों ? मैं बोला सर मालूम नही इसके बाद फिर कब आपके सांथ कॉफी पीने का मौका मिले. और उन्होने कॉफी स्वीकार कर ली. हाँ अब मुझे कोई शक नही था की ये NDTV के वरिष्ठ पत्रकार और प्राइम टाइम के दबंग एंकर श्री रविश कुमार जी ही थे
मैं अरविंद केजरीवाल की सादगी का दीवाना तो था ही अब रविश जी की सादगी का भी दीवाना हो चुका था. सादा जीवन उच्च विचार के जीवंत उदाहरण देख रहा था मैं. कभी सोचा नही था कि कोई टीवी स्टार वैशाली के इस छोटे से सिनिमा हाल में फिल्म देखने आता होगा. और फिर बाद में ये जान के और आश्चर्य हुआ की वो वहीं रहते हैं.
हमेशा सोचा करता था की टीवी के सब बड़े लोग ग्रेटर कैलाश या साउथ दिल्ली के रिहायशी इलाक़ों में ही रहते होंगे लेकिन ये एक शुखद आश्चर्य ही था कि हमारे आस पास भी बड़े किंतु साधारण लोग भी रहते हैं. जिस सिनिमा हॉल को मैं छोटा और सड़ा सा समझता था उसी ने मुझे रविश जी से मिलने और सांथ कॉफी का मौका दिलवाया ये सोच कर ही मेरे मन में उस जगह के लिए इज़्ज़त अब सातवें आसमान पर पहुँच जाती है जिस रिपोर्टर कि बनाई हुई एक इंग्लीश क्लासेज की रिपोर्ट का में बहूत बड़ा फॅन था यकीन मानिए उसी रिपोर्टर के सांथ इंग्लीश-विंग्लिश फिल्म देखने का मज़ा कुछ ऐसा था जिसे की मैं शब्दों में बयाँ नही कर सकता हाँ पर इतना ज़रूर कह सकता हूँ कि दिल्ली एन सी आर और मेरठ के आस पास बनाई उस इंग्लीश क्लासेज की रिपोर्ट इस फिल्म से बहुत ज़्यादा आकर्षक और मजेदार थी जहाँ एक ओर श्रीदेवी रील लाइफ स्टार थी वहीं दूसरी ओर रविश जी रियल लाइफ स्टार हैं ...